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श्री बूढ़ा केदारनाथ मंदिर

श्री बूढ़ा केदारनाथ मंदिर

केदारखंड का गढ़वाल हिमालय तो साक्षात देवात्मा है। जहां से प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री के अलावा एक और परम-पावन धाम है बूढ़ा केदारनाथ। यह धाम जिसका पुराणों में अत्यधिक मह्त्व बताया गया है। टिहरी के घनसाली में समुद्र तल से 2,000 मीटर (6,562 फीट की ऊंचाई पर विराजमान बूढ़ा केदार सबसे प्राचीन केदार है। जब सड़क सुविधा नहीं थी, तब केदारनाथ धाम पहुंचने का यही पैदल मार्ग था। केदारनाथ धाम की यात्रा से पहले बूढ़ा केदार के दर्शन जरूरी थे। प्राचीन समय में यह स्थल पांच नदियों क्रमशः बालगंगा, धर्मगंगा, शिवगंगा, मेनकागंगा व मट्टानगंगा के संगम पर था। पुराणों में उल्लिखित है कि गोत्र हत्या से मुक्ति पाने के लिए पांडव जब इस मार्ग से स्वर्गारोहण पर जा रहे थे तो बूढ़ा केदार में शिव ने उन्हें बूढ़े ब्राहमण के रूप में दर्शन दिए थे। शिव के बूढ़े रूप में दर्शन देने के कारण ही इस स्थान का नाम बूढ़ा केदार पड़ा। बूढ़ा केदार मंदिर के अंदर एक विशाल शिला है, जबकि मंदिर के कुछ दूरी पर ही दोनों नदियों बाल गंगा और धर्म गंगा का संगम है। यहां पर स्नान करना पुण्यदायी माना गया है। यहां इन दोनों नदियों के संगम पर आरती भी की जाती है।

प्राचीन मान्यताओ के अनुसार बूढ़ा केदार नाथ मंदिर के पुजारी गुरु गोरक्ष् नाथ सम्प्रदाय के नाथ रावल लोग होते है। नाथ जाति के सिर्फ वही लोग ही पूजा कर सकते हैं, जिनके कान छिदे हों। इस क्षेत्र के देश-विदेश में रहने वाले प्रवासी अपने आराध्य के दर्शन हेतु वर्ष में जरूर आते है। बूढ़ा केदार पवित्र तीर्थस्थल होने के साथ-साथ एक सुरम्य स्थल भी है। यह इलाका अपनी सुरम्यता के कारण पर्यटको को अपनी ओर आकर्षित करने की पूर्ण क्षमता रखता है। जिला टिहरी के घनशाली से 30 कि0मी0 दूरी पर स्थित यह स्थल पर्यटकों को शांति एवं आनंद प्रदान करने में सक्षम है।