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वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली

महान योद्धा - वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली

उत्तराखण्ड प्रदेश में बड़े-बड़े महान योद्धाओं ने जन्म लिया है। जिनमें चन्द्र सिंह गढ़वाली का नाम सर्वोपरि माना जाता है। वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का जन्म 25 दिसम्बर 1891 में ग्राम मासी, रौणीसेरा, चौथान पट्टी, गढ़वाल में हुआ था। उन्होंने 23 अप्रैल, 1930 को अफगानिस्तान के निहत्थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया था। बस यहीं से एक नई क्रान्ति का सूत्रपात शुरू हो गया था। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भारत में उनके राज के कुछ ही दिन बचे हैं। इस विभूति की एक कमजोरी थी कि वह एक पहाड़ी था, जो टूट जाना पसन्द करते हैं, लेकिन झुकना नहीं। वीर चन्द्र सिह जी भी कभी राजनीतिज्ञों के आगे नहीं झुके। जिसका प्रतिफल यह हुआ कि स्वतंत्रता संग्राम के इस जीवट सिपाही को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी जेल जाना पड़ा। इनकी जीवटता को कभी भी वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। श्री गढ़वाली एक निर्भीक देशभक्त थे, वे बेड़ियों को “मर्दों का जेवर कहा करते थे। जेल से रिहा होने के बाद कुछ समय तक वे आनन्द भवन, इलाहाबाद में रहने के बाद 1942 में अपने बच्चों के साथ वर्धा आश्रम में रहे। भारत छोड़ो आन्दोलन में उत्साही नवयुवकों ने इलाहाबाद में उन्हें अपना कमाण्डर इन चीफ नियुक्त किया। इसी दौरान उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया, नाना जेलों में कठोर यातनायें दी गई, 6 अक्टूबर, 1942 को उन्हें सात साल की सजा हुई। 1945 में ही उन्हें जेल से छोड़ दिया गया, लेकिन उनके गढ़वाल प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। उनके अंतिम दिन काफी कष्टों में बीते। जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम पर लोग मलाई चाट रहे थे, वहीं गढ़वाली जी अपने साथियों की पेंशन के लिये संघर्ष कर रहे थे। उनका सपना था कि उत्तराखण्ड पृथक आत्मनिर्भर राज्य बनें। जिसकी राजधानी भी उत्तराखण्ड के केन्द्र में हो। यह सपना था कि दूधातोली जो उनका पैतृक स्थान था उसका विकास हो, वहां पर गढ़वाल नगर बसे। राजा भरत की जन्म स्थली कण्व आश्रम, कोटद्वार में भरत नगर बसाया जाय। लेकिन दुर्भाग्य है कि राज्य मिलने के इतने समय बाद भी उनके सपने अधूरे हैं। लम्बे संघर्ष के बाद वीर चन्द्र सिंह गढ़वपाली का 1 अक्टूबर, 1979 को निधन हुआ। इस अमर सेनानी को हमारा कोटि कोटि प्रणाम।