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सलूड़ गांव का रम्माण

सलूड़ गांव का रम्माण

जिला चमोली गढ़वाल की पैनाखण्डा पट्टी, जोशीमठ विकास खण्ड के सलूड़-डुंग्रा गांव में प्रतिवर्ष रम्माण उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस उत्सव को 2009 में यू0एन0ओ0 ने विश्वधरोहर घोषित किया है। यह उत्सव सलूड गांव में प्रतिवर्ष अप्रैल में आयोजित किया जाता है। इसमें सलूड गांव का रम्माण ज्यादा लोक प्रिय हैं इसका आयोजन सलूड- डूंग्री की संयुक्त पंचायत करती है। रम्माण एक पखवाड़े तक चलने वाले विविध कार्यक्रमों, पूजा और अनुष्ठानों की एक श्रंखला है। इसमें सामूहिक पूजा, देवयात्रा, लोकनाट्य, नृत्य, गायन, मेला आदि विविध रंगी आयोजन होते है। यह भूम्याल देवता के वार्षिक पूजा का अवसर भी होता है और क्षेत्र के लोगों को देवताओं से भेंट करने का अवसर भी प्राप्त होता है।

इस आयोजन की शुरूआत बैसाख की संक्रान्ति अर्थात विखोत (बैसाखी) से मानी जा सकती है। बैसाख की संक्रांति को भूम्याल देवता को बाहर निकाला जाता है। धारी भूम्याल के लवोटू को अपने कन्धे के सहारे खड़ा कर नाचते हैं। 3 गते बैसाख से दिन देवता गांव भ्रमण पर जाता है। बैसाखी के तीसरे दिन की रात्रि से लेकर रम्माण आयोजन की तिथि तक हर रात्रि को भूम्याल देवता के मन्दिर प्रांगण में मुखौटे पहन कर नृत्य किया जाता है।

अन्तिम दिन लोकशैली में रामायण के कुछ चुनिंदा प्रसंगों के साथ-साथ पौराणिक, ऐतिहासिक एवं मिथकीय चरित्रों की घटनाओं को प्रस्तुत किया जाता हैं। रम्माण का आधार रामायण की मूलकथा है। उत्तराखण्ड की प्राचीन मुखौटा परम्पराओं के साथ जुड़कर रामायण ने स्थानीय रूप ग्रहण किया। रामायण से रम्माण बनी। धीरे-धीरे यह नाम पूरे पखवाड़े तक चलने वाले कार्यक्रम के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा।