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गौचर मेला

गौचर मेला

विश्वभर में भारत मेलों एवं सांस्कृतिक आयोजनों का देश माना जाता है। ये मेले न सिर्फ लोगों के मिलन अवसर व स्थल होते हैं। वह हमारी सांझी संस्कृति पूर्ति, विचारों और रचनाओं के भी साक्ष्य व साम्य स्थल होते हैं। और फिर पर्वतीय समाज के मेलों का स्वरूप तो अपने आप में एक अलग आकर्षण का केन्द्र होता है। उत्तराखण्ड में ये मेले सदा ही संस्कृति और विचारों के मिलन स्थल रहे हैं। यहां के प्रसिद्ध मेलों में से एक अनूठा मेला है, गौचर मेला।

पिथौरागढ व चमोली में भोटिया जनजाति के लोगों की पहल से यह मेला शुरू हुआ है। उत्तराखण्ड के जनपद चमोली में गौचर बाजार जीवन के रोजमर्रे की आवश्यकताओं का हाट बाजार है। यही हाट बाजार धीरे-धीरे मेले के स्वरूप में परिवर्तित हो गया है। गढ़वाल के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर के सुझाव पर नवम्बर 1943 में प्रथम बार गौचर में व्यापारिक मेले का आयोजन किया गया। बाद में इस मेले ने औद्योगिक विकास मेले एवं सांस्कृतिक मेले का स्वरूप धारण कर लिया है। मेले में पहले तिथि का निर्धारण हर वर्ष भिन्न-भिन्न होता था। परन्तु आजादी के पश्चात् गौचर में मेले का आयोजन 14 नवम्बर से एक सप्ताह की अवधि तक किये जाने का निर्णय लेकर इसे निश्चित कर गया।

मेले में घरेलू व रोज की आवश्यक वस्तुओं की दुकानें लगाई जाती है। मेले में स्वास्थ्य, पंचायत, सहकारिता, कृषि, पर्यटन आदि विषयों पर विचार गोष्ठियां होती हैं। मेले में स्वस्थ मनोरंजन, संस्कृति के आधार पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। मनोरम घाटी के तट पर बसा है गौचर। यह राष्ट्रीय राजमार्ग पर चार धाम यात्रा मार्ग पर पड़ता है। यह राज्य के अन्य मुख्य शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा है। यहाँ यात्रियों के लिए समस्त आवश्यक सुविधाएं हैं। बस, टैक्सी तथा अन्य स्थानीय यातायात की सुविधायों के अलावा ग.म.वि.नि. का गेस्ट हाउस भी यहां है।