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अमर योद्धा – जसवंत सिंह रावत

अमर योद्धा – ‘जसवंत सिंह रावत’

जसवंत सिंह 4 गढ़वाल रेजिमेंट के एक आम सैनिक थे। वह अपनी बटालियन की टुकड़ी के साथ अरुणाचल प्रदेश की सुरक्षा के लिए भेजे गये थे। इसी दौरान चीनी सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी। उसने हिमालय के कुछ पहाड़ों पर अपना कब्जा कर लिया था। भारत की तरफ से जसंवत अपनी टुकड़ी के साथ मोर्चे पर तैनात थे व पल पल चौकन्ने थे। तभी चीन की तरफ से गोलाबारी शुरु हुई और उन्होंने अपने साथियों के साथ मोर्चा संभाल लिया। धीरे-धीरे समय बीतता गया और सेना के पास जरूरत का सामान खत्म होने लगा। इसलिए सेना को आदेश दिया गया कि वह वहां से हट जायें। सभी के हौंसले पस्त होने लगे थे। लगने लगा था कि अब चीनी सेना अरुणाचल पर कब्जा कर लेगी। सेना ने भी कदम वापस करना शुरु कर दिया था। तभी जसवंत सिंह ने आगे बढ़ते हुए तय किया कि वह पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने पीछे हटने के आदेश से बगावत कर दी।

माना जाता है कि उनके इस रवैये के कारण उन्हें सेना से बेदखल कर दिया गया था। जसवंत फिर भी नहीं माने वह अपने फैसले पर अटल रहे। मतलब सैन्य आदेश के कारण सेना पीछे हट गयी और जसवंत अकेले मोर्चे पर डंटे रहे। उनका हौंसला एक पल के लिए भी नहीं डगमगाया। ऐसा नहीं था कि वह खतरे से अनजान थे, पर वह जानते थे कि जंग कितनी भी बड़ी क्यों न हो, जीतना नामुमकिन नहीं होता। जसवंत को पता था कि अगर चीनी सैनिकों को इस बात का आभास हो गया कि भारतीय सेना मोर्चे से वापस जा चुकी है तो उनके हौसले बुलंद हो जायेंगे। इसलिए वह दुश्मन पर घात लगाकर बैठ गये.। उन्होंने एक रणनीति के तहत सेना के बनाए बंकरों में बंदूकें लगा दी। इसके बाद सारा गोला बारूद अपने पास इक्कठा करके रख लिया। माना जाता है कि जिस स्थानीय गांव के पास जसवंत सिंह दुश्मन पर घात लगाये हुए बैठे थे। वहां पर दो बहनें सेला और नूरा भी थीं। जिन्होंने जसवंत की बहादुरी को देखकर फैसला किया कि वह उनकी मदद करेंगी। दोनों बहनों ने बंकर में बंदूकें लगाने में जसवंत की सहायता की। यही नहीं उन्होंने जसवंत के खाने-पीने का भी ख्याल रखा। जब जसवंत को एहसास हुआ कि अब वह पकड़े जायेंगे।, तो उन्होंने चीनी सैनिकों के हाथों पकड़े जाने से बेहतर मौत को गले लगाना ज्यादा बेहतर समझा। जंग खत्म होने के बाद पता चला कि जसवंत ने अकेले ही 100 से 300 के आसपास चीनी सैनिकों को मार गिराया था। जसवंत की इस बहादुरी को देख उनकी याद में ‘जसवंत गढ’ का निर्माण हुआ।

दिलचस्प बात यह है कि ‘जसवंत गढ’में एक मकान बना हुआ है। माना जाता है कि जसवंत सिंह आज भी इसमें रहते हैं। इसलिए उस घर में आज भी उनके लिए नाश्ता बनाया जाता है और उनका बिस्तर सजाया जाता है। कहते हैं कि हर सुबह जसवंत के बिस्तर पर सिलवटें पड़ी होती हैं, जैसे रात में कोई उस पर सोया हो। ऐसी मान्यता है कि जसवंत आज भी उस जगह की रक्षा में तैनात हैं। जसवंत पहले ऐसे सैनिक माने जाते हैं जो मौत के बाद भी सेना का हिस्सा हैं। उन्हें समय-समय पर प्रमोशन भी मिला है। मौजूदा समय में वह मेजर जनरल के पद पर हैं। जसवंत को उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया है।