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गौरा देवी - चिपको आन्दोलन

गौरा देवी - चिपको आन्दोलन की जननी

विश्व प्रसिद्ध चिपको आन्दोलन की जननी गौरा देवी के बारे में भला कौन नहीं जानता होगा। इस आन्दोलन को विश्व पटल पर स्थापित करने वाली महिला गौरा देवी ने पेड़ों के महत्व को समझा। उन्होंने जिला चमोली के रैंणी गांव में जंगलों के प्रति अपने साथ की महिलाओं को जागरूक किया। तब पहाड़ों में वन निगम के माध्यम से ठेकेदारों को पेड़ काटने का ठेका दिया जाता था। गौरा देवी को जब पता चला कि पहाड़ों में पेड़ काटने के ठेके दिये जा रहे हैं तो उन्होंने अपने गांव में महिला मंगलदल का गठन किया। गांव की औरतों को समझाया कि हमें अपने जंगलों को बचाना है। गौरा देवी ने कहा आज दूसरे इलाके में पेड़ काटे जा रहे हैं, हो सकता है कल हमारे जंगलों को भी काटा जायेगा। इसलिए हमें अभी से इन वनों को बचाना होगा। गौरा देवी ने कहा कि हमारे वन हमारे भगवान हैं इन पर हमारे परिवार और हमारे मवेशी पूर्ण रूप से निर्भर हैं।

उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आन्दोलन में उत्तराखण्ड की जनता और खास तौर पर मातृ शक्ति ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गौरा देवी ने 1974 में इस विश्व विख्यात चिपको आन्दोलन की शुरूआत की। गौरा देवी चिपको वूमन के नाम से मशहूर हैं। 1925 में चमोली जिले के लाता गांव के एक मरछिया परिवार में श्री नारायण सिंह के घर में इनका जन्म हुआ था। गौरा देवी ने कक्षा पांच तक की शिक्षा ग्रहण की थी, जो बाद में उनके अदम्य साहस और उच्च विचारों का सम्बल बनी। मात्र 11 साल की उम्र में इनका विवाह रैंणी गांव के मेहरबान सिंह के साथ हुआ।

महिला मंगल दल का प्रतिफल था, हर गांव में महिला मंगल दलों की स्थापना हुई। सबसे पहले गौरा देवी को रैंणी गांव की महिला मंगल दल का अध्यक्ष चुना गया। श्रीमती गौरा देवी जंगलों से अपना रिश्ता बताते हुये कहतीं थीं कि “जंगल हमारे मैत (मायका) हैं। उन्हें दशौली ग्राम स्वराज्य मण्डल की तीस महिला मंगल दल की अध्यक्षाओं के साथ भारत सरकार ने वृक्षों की रक्षा के लिये 1986 में प्रथम वृक्ष मित्र पुरस्कार प्रदान किया गया। जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा प्रदान किया गया था। उन्हें कालांतर में देश-विदेश से कई अन्य पुरस्कार मिले। जीवन भर वृक्षों के संरक्षण को संघर्ष करते हुए चार जुलाई 1991 को तपोवन में उनका निधन हो गया।

मृत्यु से पूर्व गौरा देवी ने कहा था ‘मैंने तो शुरुआत की है, नौजवान साथी इसे और आगे बढाएंगे’। आज पर्यावरण की हो रही क्षति’ और हमारी अगली पीढ़ी के भविष्य को देखते हुए ‘गौरा जी’ का यह आंदोलन मानवता व वृक्ष और पर्यावरण रक्षा का बेहद आवश्यक संदेश है। सरकार ने गौरा देवी के गांव में उनके नाम से एक स्मृति द्वार बनाया है।