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एक झलक गढ़वाल की

एक झलक गढ़वाल की

हिमालय की गोद में उत्तराखण्ड राज्य अपनी लोक संस्कृति, तीर्थाटन एवं पर्यटन के रूप में जाना जाता है। उत्तराखण्ड प्रदेश में दो मण्डल व 13 जनपद है। जिसमें सात जिले गढ़वाल मण्डल में व छः जिले कुंमाऊ मण्डल में आते हैं। हम आज बात कर रहे हैं गढ़वाल मण्डल की। कोटद्वार को गढ़वाल का प्रवेश द्वार कहा जाता है। कोटद्वार से ही गढ़वाल की संस्कृति से जुड़ी कृषि, बागवानी, व्यवसाय और ऊंची-ऊंची पर्वतमालाओं के दर्शन होते हैं। विश्वभर में गढ़वाल की लोक संस्कृति अपने-आप में गौरवमयी संस्कृति है। यहां के रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, मेले व जीवन-जीने की शैली, अपने आप में अपनी निराली लोक संस्कृति की पहचान है।

हमने स्वयं देखा कि गढ़वाल में विकास होने के साथ-साथ यहां की संस्कृति आज भी कायम है। आज भी गढ़वाल में ऋतुओं के अनुसार ही तीज-त्योहार, व खान-पान बनाये जाते हैं। आज-कल का मौसम यहां न ज्यादा गर्म और न ज्यादा ठण्डा था, मौसम सामान्य है। आज भी गढ़वाल में कलाकृतियों का बहुत महत्व है। घरों को देखकर लगा कि आज भी दरवाजों के चौखट पर देवी-देवताओं, हाथी, शेर, मोर आदि के चित्र बनाये जाते हैं। यह कलाकृतियाँ हमारे गढ़वाल में आज भी शुभ मानी जाती हैं। हमारी लोक संस्कृति में संगीत और उससे जुड़े बाद्य यंत्रों जैसे नगाड़ा, ढोल, दमऊ-रणसींगा, भेरी, हुड़का, बीन का बहुत महत्व है, इसीलिए आज भी देव के देवरे में इनकी ध्वनि गूँजती है।