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गढ़वाल का मंडाण नृत्य

गढ़वाल का मंडाण नृत्य

उत्तराखण्ड देवभूमि के नाम से विश्व विख्यात है। ऐसा माना जाता है कि इस प्रदेश में देवी-देवताओं ने वास किया है। इस प्रदेश में देवभूमि का प्रमाण है देश के चार धामों में से एक धाम बद्रीनाथ, उत्तराखण्ड में स्थित है। इसके अतिरिक्त अनेकों तीर्थ गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ के साथ हरिद्वार, ऋषिकेश भी यहीं स्थित है। पवित्र नदियां गंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनन्दा आदि नदियों का उद्गम स्थल भी उत्तराखण्ड ही है। देवभूमि उत्तराखण्ड में सबसे ज्यादा समय तक पांडवों के यहां रहने के प्रमाण मिलते हैं। आज भी गढ़वाल के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में यह धारणा और मान्यता है कि मनुष्यों पर पाण्डवों के अवतार अवतरित होते हैं। इन पाण्डवों के अवतरण की एक नृत्य प्रस्तुति होती है उसमें जो संगीत बजता है उसे मंडाण कहते है।

पाण्डवों के अवतार के समय बजने वाले यह मंडाण उत्तराखंड के प्राचीन नृत्यों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। इस नृत्य का गाँव के मैदान और आंगन में आयोजन किया जाता है। विवाह या धार्मिक अनुष्ठान के अवसर पर मंडाण में जन-समुदाय का उत्साह देखने लायक होता है। पर्वतीय क्षेत्रों के गाँव का एक सामूहिक आंगन, जो गांव के बीच में होता है वहां एक कुण्ड में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। इसके पश्चात् सभी पारंपरिक वाद्य यन्त्र वादक (ढोल, दमोऊ, रणसिंहा, भंकोर) गीतों के द्वारा देवी-देवताओं का आह्वाहन किया जाता है। ज्यादातर गीत महाभारत के विभिन्न घटना क्रम से सम्बंधित होते हैं। मंडाण नृत्य के समय लोक कथाओं से जुड़े गीत भी गाये जाते हैं। उपस्थित सभी जन गीतों और वाद्य यंत्रों की ताल पर झूम उठते हैं। कुछ लोग मंडाण नृत्य को पाण्डव नृत्य भी कहते हैं।