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गढ़वाल की लोक संस्कृति

अपना उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है, जिसके गढ़वाल मण्डल में सात जिले आते है। इसमें हरिद्वार मात्र एक जिला मैदानी क्षेत्र में आता है। गढ़वाल की लोक संस्कृति अपने-आप में गौरवमयी संस्कृति है। यहां के रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, मेले, व यहां लोगों के जीवन-जीने की शैली, लोक संस्कृति को बयां करता है। गढ़वाल पर्वतीय क्षेत्र है इसलिए यहां घरों को पक्का बनाया जाता है। मकानों में सीमेंट की छत न डालकर भारी पत्थरों को बिछाया जाता है। गढ़वाल में मौसम के अनुसार तीज-त्योहार, व खान-पान बनाया जाता है। लोक संस्कृति के पारम्परिक रूप से गढ़वाल की महिलाएं घाघरा-कुर्ता, आंगड़ी व पुरूष चूढ़ीदार पजामा व कुर्ता पहनते हैं। सर्दियों में यहां के लोग ऊनी कपड़ों का उपयोग अधिक करते हैं। गढ़वाल का लोक कलाओं में भी अपना एक स्थान है। यहां घरों में भी लोक कला प्रदर्शित होती है। घरों में सजावट के तौर पर खिड़कियों व दरवाजों में कलाकृतियां बनाई जाती थी। दरवाजों के चौखट पर देवी-देवताओं, हाथी, शेर, मोर आदि के चित्रों को बनाने की परम्परा है। लोक संस्कृति का प्रतीक वाद्य यंत्रों में नगाड़ा, ढोल, दमऊ-रणसींगा, भेरी, हुड़का, बीन डौंरा, कुरूली, अलगाजा प्रमुख है। यहां के लोक गीतों में न्योली जोड़, छपेली, बैरव प्रमुख होते है। मुख्य बात इन गीतों की रचना स्थानीय ही लोगों द्वारा की जाती है। गढ़वाल मण्डल में हर क्षेत्रों में अपनी-अपनी बोलियां बोली जाती है। जिसमें थोड़ी थोड़ी सी भिन्नताएं होती हैं। इतने विभिन्नताओं के बावजूद भी हमारी संस्कृति एक है, तभी तो बेमिसाल है हमारा गढ़वाल।