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इस बार मौका मिलते ही केदारनाथ धाम जाने की योजना बनी. गुडगाँव से ऋषिकेश होते हुए हम आगे बढे. लहराती सड़कों, उतरते-चढ़ते, पहाड़ों से होते हुए. जगह-जगह प्रयाग, संगम, गंगा के पर्याय नदियां देखने को मिली. विचार आया आखिर सनातन परम्पराओं में इन धामों का इतना महत्व क्यों है ? सैंकड़ों-हज़ारों सालोँ से ऋषि-मुनि, तपस्वी क्यों यहाँ आएं ? आखिर कुछ तो है इन तीर्थ स्थानों में. रुद्रप्रयाग से अगस्त्यमुनि, भिड़ी, गुप्तेश्वर होते हुए गौरीकुंड, रामबाडा पहुंचे. यूँ तो रास्ते में दिखे दिलकश दृश्यों, घाटियों, खेतों, हरे-भरे पेड़ों और पहाड़ी घरों ने महानगरों की भीड़ को भुला दिया. यात्रा लम्बी थी लेकिन थकान महसूस नहीं हुई. सड़कें अच्छी थी. थोड़ा विश्राम कर, मंदिर दर्शन की लिए तैयार हुए. ब्रह्ममहूर्त में वातावरण सचमुच बेहद आध्यात्मिक था. गर्भगृह में पहुंचते ही मेरे प्रश्नों के उत्तर स्वयं ही दे रहे थे बाबा भोलेनाथ. केदार धाम में एक अदभुत आलोक लिए बैठे हैं भोले बाबा. शायद हम ही हैं जो सांसारिक बंधनो में बंधे बहुत कुछ देख नहीं पाते.

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खिरसू की सुबह बेहद यादगार और मनोरम थी. नींद जल्दी खुली, कुछ अनजान से कोलाहल के बीच, चिड़ियों की चहक के साथ. बाहर निकला तो स्तब्ध. गढ़वाल मंडल के गेस्ट हाउस के आँगन में कुछ दुर्लभ पक्षी उछल-कूद रहे हैं. सामने निगाह पड़ी, हिमालय की बर्फीली चोटियां पूर्व की दिशा में सोने में रंगी हैं, सूर्यदेव के प्रकाश ने क्या मनमोहक दृश्य बना दिया है. घाटी में अभी भी हल्का अँधेरा पसरा है किन्तु निकट दृष्टि में महकते पुष्प, लहराते वृक्ष और ऊपर से ये चिड़ियों का मधुर गान ...वाह खिरसू! पौड़ी से मात्र २० किलोमीटर और श्रीनगर से ३१ किलोमीटर दूर. कितनी बार उत्तराखंड आया किन्तु ऐसी शांत, एकांत मनोरम जगह, समस्त सुविधाओं के बीच, अपेक्षा नहीं की थी.

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